Tuesday, 13 May 2014

बस यूं ही...........

देख अलादीन साल गुज़र गएं इस दफ़ा चराग़ तेरे हाथ में है बस एक ही ख्वाइश पूरी होगी और, भेड़िया फ़िर से घात में है कब तक सपनों को बेच बेचकर जूठी थाली ही तू खायेगा दिल्ली तुझसे फ़िर पूछ रही है जो भी है इस रात में है 

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